आखिर क्यों रह जाती है बुंदेलखंड की कुशवाहा किसान बेटियों की शिक्षा अधूरी ?
भारत में शिक्षा को मौलिक अधिकार घोषित किए जाने के बावजूद भी विभिन्न क्षेत्रों में यह अधिकार केवल कागजों तक सीमित रह गया है। शिक्षा किसी भी समाज का दर्पण होती है। लेकिन जब बात पिछड़ा, दलित, आदिवासी और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की होती है तब यह दर्पण अक्सर धुंधला दिखाई पड़ता है। विशेषकर बुंदेलखंड के ग्रामीण क्षेत्रों और हाशिए पर बसे समुदायों की बेटियों की शिक्षा अब भी अनेक बाधाओं से घिरी हुई है।
बुंदेलखंड क्षेत्र, जो भारत के हृदयस्थल के रूप में जाना जाता है और यह अपनी ऐतिहासिक धरोहर, साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासत के लिए विश्वविख्यात है। यह क्षेत्र उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के कुछ जिलों में फैला एक विस्तृत भूखण्ड है। जो वर्तमान में सामाजिक, राजनैतिक, शैक्षिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पिछड़ेपन का प्रतीक बन गया है।
इसी बुंदेलखंड में प्रमुख कृषक समुदायों यानि किसान वर्ग में से एक है - कुशवाहा किसान। कुशवाहा बुंदेलखंड की प्रमुख जाति है। कुशवाहा किसान जनसंख्या के हिसाब से बहुसंख्यक हैं। कुशवाहा किसान बेटियों की शिक्षा अक्सर अधूरी रह जाती है। यह अधूरापन मात्र शैक्षिक विफलता नहीं, बल्कि एक सामाजिक और मानसिक जड़ता का परिणाम है। यह समुदाय शिक्षा को लेकर अपेक्षाकृत जागरुक तो है, लेकिन संसाधनों की कमी, सामाजिक दबाव, रूढ़िवादिता और मनुवादी सोच के चलते इस समुदाय की लड़कियों की शिक्षा में बड़ी बाधाएँ आती हैं।
बुंदेलखंड गरीबी, जल संकट, कृषि संकट, किसान दुर्दशा, जलवायु परिवर्तन और बेरोजगारी के कारण पलायन जैसी समस्याओं से लम्बे समय से जूझ रहा है और वर्तमान में भी उक्त स्थिति में कुछ खास सुधार देखने को नहीं मिलते हैं। इन परिस्थितियों के चलते ही कुशवाहा किसान समुदाय की स्थिति दयनीय बनी हुई है।
कुशवाहा समुदाय पंरापरागत रूप से कृषि से जुड़ा रहा है। इस समुदाय की आय का मुख्य स्त्रोत कृषि उत्पाद और छोटे स्तर पर सब्जियाँ बेचना है। इसलिए निम्न आय के कारण यह समुदाय शिक्षा क्षेत्र में निवेश नहीं कर पाता, विशेषकर बेटियों की शिक्षा को अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। इस समुदाय के परिवारों में बेटियों की स्थिति ग्रामीण क्षेत्र के अन्य समुदायों की अपेक्षा कहीं अधिक जटिल और चुनौतीपूर्ण है। यह समुदाय अपने सीमित संसाधनों का अधिकतर हिस्सा बेटों पर खर्च करता है, जबकि बेटियों को घरेलू कार्यों, खेती और पशुपालन में लगा देता है।
इन परिस्थितियों के चलते कुशवाहा किसान परिवारों की बेटियाँ प्राथमिक स्तर की शिक्षा तो ले लेती हैं, परंतु माध्यमिक और उच्चमाध्यमिक स्तर तक पहुँचते-पहुँचते इनकी संख्या तेजी से घटने लगती है। लगभग आठवीं कक्षा तक पहुँचते ही अधिकतर बेटियाँ स्कूल छोड़ देती हैं। 2-4% बेटियाँ ही इंटरमीडिएट के बाद उच्च शिक्षा प्राप्त कर पाती हैं।
बुंदेलखंड में कुशवाहा किसान समुदाय के पिछड़ेपन और निम्न साक्षरता दर के अनेक कारण हैं। जिसमें आर्थिक कारण देखा जाए तो इस समुदाय के आय स्त्रोत कम होते हैं। जिसके कारण ये किसान अपने जीवन की पूँजी बेटों पर खर्च कर देना चाहते हैं और बेटियों को घरेलू कार्यों में व्यस्त कर देते हैं। दूसरा कारण माध्यमिक स्कूल 5-10 किलोमीटर दूर होते हैं, जहाँ पैदल या साईकिल से जाना असुरक्षित माना जाता है। तीसरा सामाजिक कारण है गाँव। चौपाल, पंचायतों आदि में उम्रदराज लोगों द्वारा बेटियों को पराया धन मानने वाली विचारधारा के चलते इस समुदाय में बेटियों को उच्च शिक्षा दिलाने से बेहतर उनका जल्दी विवाह कर देने से ही समाज की मयार्दा बनी रहेगी। समाज की इस स्त्रीविरोधी सोच के बावजूद जो बेटियाँ पढ़ती हैं, तो उनका जबरन विवाह कर दिया जाता है, जिससे उनकी पढ़ाई बीच में ही रुक जाती है।
इस समुदाय के अधिकतर लोग रूढ़िवादी विचारों के तले बड़ी बुरी तरह दबे हुए हैं, जिसके चलते वे बेटों को घर का चिराग और बेटियों को पराया धन मानने वाली दूषित मानसिकता के कारण बेटियों को घरेलू कार्यों में लगा देते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उनकी पढ़ाई के प्रति रुचि समाप्त हो जाती है और शेष समय वह साज-श्रृंगार मे लगा देती हैं। इन परिस्थितियों को देखते हुए माता-पिता में समाज का भय घर करने लगता है कि बेटी बड़ी हो रही है और यदि कभी ये किसी समय प्रेम-प्रसंग में पड़ गई तो इज्जत चली जाएगी, घरवालों की नाक कट जाएगी। इसके चलते इस समुदाय के लोग अपनी बेटियों का 15-17 वर्ष की आयु में ही विवाह कर देना सबसे उचित मानते हैं। माता-पिता के इस अनुचित कदम के कारण जो बेटियाँ अपनी शिक्षा को आगे भी जारी रखना चाहती है, वो उनका एक सपना बन कर रह जाता है।
आर्थिक - सामाजिक कारणों के अलावा भी एक और महत्त्वपूर्ण कारण मैं मनुवादी सोच और ब्राह्मणवादी विचारधारा को मानती हूँ। जो समाज के गैर-ब्राह्मण वर्गों को षड्यंत्र और भ्रमजाल के जरिए मूलभूत आवश्यकताओं और अधिकारों से भी वंचित रखने हेतु कार्य करता है और सबसे ज्यादा ब्राह्मणवाद का शिकार कुशवाहा किसान समुदाय होता है।
मनुवादी भ्रमजाल में आठ वर्ष की आयु से ही बच्चियों को फँसाया जाता है, जब इन्हें देवी का रूप देकर इनका कन्यापूजन किया जाता है। यहीं से इन बेटियों को मनुवादी विचारधारा का शिकार बना लिया जाता है। इनके मन-मस्तिष्क में यह बात घर कर जाती है कि हमारे भीतर एक दैवीय शक्ति है, जो सब कुछ सही करने का सामर्थ्य रखती है। जिससे चाहे वे शिक्षा ग्रहण करें अपितु नहीं इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
जैसे-जैसे वे यौवनावस्था तक पहुँचती हैं, उन्हें अगले जाल यानिकि साज-श्रृंगार में फँसाया जाता है। जिसमें व्रत, कथा, पूजा में ब्राह्मणों द्वारा बताया जाता है कि स्त्रियों को पूरे सोलह श्रृंगार करने चाहिए। श्रृंगार की महत्त्वता का मन में घर कर जाने से उनका शिक्षा और यथार्थ से परिचय नहीं हो पाता और पूरा ध्यान साज-श्रृंगार पर केन्द्रित हो जाता है। उन्हें बतलाया जाता है कि स्त्रियों को श्रृंगार कराना अत्यंत आवश्यक है, जो स्त्री श्रृंगार करती है उसका घर धन-धान्य से परिपूर्ण रहता है। इस प्रकार वे ब्राह्मणवादी फिजूल ज्ञान के चलते बाह्य-आडंबरों में फँसकर रह जाती हैं। जिससे न तो वे सत्य की खोज का प्रयास करती हैं और न ही यथार्थ से अपना परिचय करा पाती हैं, जिसके चलते उनका बहुआयामी शोषण होने के अवसर बढ़ जाते हैं। इसी के चलते ग्रामीण क्षेत्रों में अधिकतर स्त्रियाँ छली जातीं हैं।
कहीं-न-कहीं बेटियों की शिक्षा में बाधा का कारण स्वयं माँ होती है क्योंकि इनको भी ऐसी परिस्थितियों में पाला-पोषा गया होता है। ऐसा देखा गया है कि अधिकतर माताएँ अनपढ़ होती हैं। जिसके कारण वे बेटियों को शिक्षा के लिए प्रेरित नहीं कर पातीं। रूढ़िवादी परम्पराओं का बोझ वे खुद भी ढोती हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी अशिक्षित बेटियों को भी ये असहनीय बोझ मजूबरन ढोना पड़ता है।
आज भी विवाह, परिवार और मातृत्व को स्त्री के जीवन का मुख्य उद्देश्य माना जाता है। पढ़ाई-लिखाई को इससे भटकाव के रूप में देखा जाता है। जिससे बेटियों की साक्षरता दर तेजी से घट जाती है।
इस साक्षरता दर को यदि हम आँकड़ों में देखें तो यह आँकड़े और भी विचार करने को विवश करते हैं कि आधुनिक युग की 21वीं सदी में भी शिक्षा जैसी मूलभूत ईकाई को अनदेखा किया जाता है।
एक रिपोर्ट के अनुसार लगभग 94% लड़कियाँ प्राथमिक स्तर (कक्षा 1-5) में नामांकन तो कराती हैं लेकिन प्राथमिक स्तर की आखिरी कक्षा यानि कक्षा पाँचवीं तक आते-आते इनका नामांकनप्रतिशत घटकर 68% रह जाता हैं, वहीं बात करें माध्यमिक स्तर की तो कक्षा 6 की लगभग 29% लड़कियाँ स्कूल छोड़ देती हैं। यह प्रतिशत यहीं नहीं रुकता, कक्षा 10वीं तक आते-आते 52% लड़कियाँ स्कूल छोड़ देती हैं। डायस (डीआईएसई) रिपोर्ट-2022 के अनुसार 6वीं से 10वीं कक्षा में स्कूल छोड़ देने की दर अधिक है। एक स्थानीय एनजीओ सर्वे-2023 के अनुसार लड़कियों की कॉलेज तक पहुँचने की दर 8% से भी कम है। आईएलओ रिपोर्ट-2023-2024 के अनुसार लगभग 81% ग्रामीण लड़कियाँ घरेलू कार्यों में पूर्णतः व्यस्त हैं। एनएफएचएस रिपोर्ट-2019-21 के अनुसार स् लगभग 23.9% लड़कियों का विवाह 18वर्ष की आयु पूर्ण होने से पहले ही करा दिया जाता है।एएसईआर रिपोर्ट की मानें तो शौचालय की अनुपलब्धता के कारण लगभग 10.8% लड़कियाँ स्कूल छोड़ देती हैं।
सरकारों द्वारा योजनाएँ बनाई तो जाती हैं परन्तु ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुँचते-पहुँचते दम तोड़ देती हैं। बुंदेलखंड में उत्तर प्रदेश सरकार और मध्य प्रदेश सरकार द्वारा कई योजनाएँ लागू तो की गईं हैं। जैसे - सुकन्या समृद्धि योजना, कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय योजना इत्यादि। लेकिन इन योजनाओं का जमीनी स्तर पर प्रभाव नाममात्र का रहा है, क्योंकि योजनाओं की जानकारी सही समय पर ग्रामीणों तक नहीं पहुँचती।
स्कूलों में साफ-स्वच्छ भवन, शौचालय, पीने का पानी और पुस्तकालय आदि आधारभूत संसाधनों की कमी सामान्यतः पाई गई है, इन कमियों को दूर करने के लिए सरकारों को समय-समय पर ध्यान देना चाहिए। इसमें बेटियों की साक्षरता दर बढ़ाने के लिए सरकार को अधिकतर महिला शिक्षकों की नियुक्ति करनी चाहिए, जिससे अभिभावकों में विश्वास बढ़े। कुछ स्वयंसेवी संस्थाएँ जैसे - एकल विद्यालय और विद्या बालिका फांउडेशन इत्यादि ग्रामीण लड़कियों की शिक्षा के प्रोत्साहन का कार्य कर रही हैं। ऐसे प्रोत्साहनों और जन-जागरूकता के चलते काफी हद तक कुशवाहा किसान समुदाय के अभिभावक अपनी बेटियों को नर्सिंग, बीएड, कम्प्यूटर डिप्लोमा इत्यादि कोर्स कराके स्वास्थ्य, शिक्षा, संचार के क्षेत्र में आगे बढ़ने को प्रेरित कर रहे हैं।
अतः स्थिति में सुधार लाना एक लम्बी प्रक्रिया है, जो केवल योजनाओं और घोषणाओं से नहीं, अपितु समाज के सामूहिक प्रयास और मानसिकता में बदलाव से ही संभव है। शुरुआत जमीनी स्तर से होनी चाहिए। परिवार, समाज, स्कूल, और पंचायतों से सामाजिक परिवर्तन हेतु बदलाओकारी क्रांति होनी चाहिए। इन बेटियों में असीम संभावनाएँ हैं। यदि इन्हें शिक्षा, सुरक्षा और आत्मसम्मान के अवसर दिए जाएँ तो वे न केवल परिवार को गरीबी से निकाल सकती हैं बल्कि अखंड बुंदेलखंड को सामाजिक और आर्थिक रूप से समृद्ध बना सकती हैं। ये बेटियाँ अँधेरे जीवन में शिक्षा का दीप जलाकर भविष्य को रोशन कर सकती हैं। जब तक समाज नहीं बदलेगा, तब तक सरकारी योजनाओं का प्रभाव सीमित ही रहेगा।
- आरती कुशवाहा
(स्नातक छात्रा - दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली)
बैरवार गॉंव, जतारा, टीकमगढ़, अखंड बुंदेलखंड
ईमेल : aartidelhi2002@gmail.com

