Sunday, August 18, 2024

झाँसी के कुशराज ने विकलांग विमर्शीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में पढ़ा शोधपत्र

झाँसी के कुशराज ने विकलांग विमर्शीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में पढ़ा शोधपत्र 



 

झाँसी : अखिल भारतीय विकलांग चेतना परिषद एवं प्रयास प्रकाशन बिलासपुर (छत्तीसगढ़) के संयुक्त तत्वाधान में "विकलांग विमर्श-अस्तित्व का संघर्ष" विषयक दो दिवसीय 13वीं राष्ट्रीय संगोष्ठी गीतादेवी रामचन्द्र अग्रवाल विकलांग अस्पताल अनुसंधान एवं निःशुल्क सेवा केंद्र के सभागार में आयोजित की गई। इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में जरबौ (बरुआसागर) गाँव के युवा, किसान सरोकारी, शोधार्थी कुशराज ने राष्ट्रीय विद्वानों और देशभर के 9 राज्यों से आए अनेक शोधकर्त्ताओं के बीच 'राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और विकलांगता' विषय पर अपने शोधपत्र का उल्लेखनीय वाचन किया। बिलासपुर में आयोजित इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में उत्तर प्रदेश से एकमात्र शोधार्थी कुशराज का शोधपत्र की गुणवत्ता के आधार पर वाचन के लिए चयन किया गया था। ज्ञातव्य है कि कुशराज के इस आलेख को "विकलांग विमर्श-अस्तित्व का संघर्ष" शीर्षक से प्रकाशित हो रहे शोधग्रंथ में भी शामिल किया गया है।

      

          दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के मंच पर अध्यक्ष मण्डल में अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त भाषाविज्ञानी, विकलांग विमर्श के प्रणेता, छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के पूर्व अध्यक्ष डॉ० विनयकुमार पाठक, व्यंगालोचना के आचार्य डॉ० सुरेश महेश्वरी, बुंदेलखण्ड झाँसी के संस्कृतिकर्मी व आलोचक डॉ० रामशंकर भारती, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति चंद्रभूषण वाजपेयी, गुरु घासीदास केन्द्रीय विश्वविद्यालय के हिन्दी अधिकारी डॉ० अखिलेश कुमार तिवारी, शिक्षाविद् डॉ० अनिता सिंह, प्रो० चंद्रशेखर सिंह एवं लेखिका डॉ० अनिता ठाकुर कोलकाता मंचासीन रहीं। बिलासपुर के जानेमाने साहित्यकार डॉ० ए० के० यदु ने संगोष्ठी का सफल संचालन किया।

           

          संगोष्ठी में साहित्यचेता डॉ० विवेक तिवारी, संयोजक दीनदयाल यादव, डॉ० आस्था दीवान, डॉ० मंजूश्री वेदुला, डॉ० आभा गुप्ता सहित अनेक महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों से पधारे शोधकर्त्ता और विद्वान उपस्थित रहे। समारोह के अंत में परिषद के महामंत्री मदनमोहन अग्रवाल ने सभी के प्रति आभार प्रकट किया।




कविता : बेटियों! अब तो उठाओ तलवार - प्रीतिका बुधौलिया

 * कविता : " बेटियों! अब तो उठाओ तलवार " *


कब तक होगा ये अत्याचार,

बेटियों! अब तो उठाओ तलवार।

कब तक होगा ये अत्याचार…


नाम मौमिता देवनाथ था जिसका, 

कोलकाता में वह रहती थी।

पली-बढ़ी वह जिस घर में,  

उनकी संतान अकेली थी।।


एक पिताजी मेहनत करता, 

अपनी संतान पढ़ाने को।

रात दिन वह एक है करता, 

बिटिया के सपने को पूरा करता। 


एक दिन ऐसा भी आएगा,

जब मेरी बिटिया का सपना पूरा हो जाएगा। 

इस उम्मीद भरी उन आँखों से, 

माता-पिता भरे हुए हैं आशा के सागर से। 


मेरे भी दिन बदलेंगे तब,  

डॉक्टर बन जाएगी मेरी बिटिया जब।

यह पल भी आने वाला था,

वह मंजिल मिलने वाली थी। 


एक परिवार तभी सुख पाता,

जब बिटिया का सपना पूरा हो जाता।

लेकिन वह दिन कैसे आ पाता, 

समाज यह सहन नहीं कर पाता।


हम बेटियों के जीवन में कहाँ सुख है आता,

जब भी सुख की बेला आती उससे पहले वह दिया बुझ जाता।

समाज की इस गंदी सोच को कैसे बदला जाएगा,

सरकारें तो बहुत बदलीं पर कानून कब बदल जाएगा।


समाज के दरिंदों ने न जाने कितने परिवारों को मिटाया है, 

डॉक्टर मौमिता जैसी बेटी को पुरुषों की गंदी सोच ने दफनाया है।

खत्म करो अब यह तमाशा समाज नहीं कुछ बोलेगा,

सरकार रहेगी शांत हमेशा वाचाल कभी ना बोलेगा।


जगो बेटियों! बनकर लक्ष्मीबाई हाथों में तलवार उठाओ,

 जो भी देखे नजर उठाकर उसको वहीं मार गिराओ।

ज्वाला हो तुम शक्ति हो तुम,  

अपनी शक्ति को पहचानो।


डरी हुई सी रहना,

अब यह तेरा काम नहीं।

  छोड़ो अब बहुत हुआ, 

  होगा अब नरसंहार यहीं।


स्त्री हूँ मैं नारी हूँ, 

         मैं कोई फूलों का हार नहीं। 

        तोड़ नहीं सकते तुम मुझको,

इतनी तुम्हारी औकात नहीं।


अभी यह ज्वाला बुझने न पाए, 

कानून नया अब बन जाए। 

बेटियों! अब तो उठाओ तलवार,  

ताकि दुनिया से दूर हो पाए अत्याचार।


©️ प्रीतिका बुधौलिया 

   युवा लेखिका, झाँसी

    (एक नई सोच)








Thursday, August 15, 2024

कविता : बेटियाँ - शिवांगी सेन


  * कविता - " बेटियाँ " *


बेटियाँ चाहें तो क्या नहीं कर सकतीं,

देश का नाम रोशन कर सकतीं हैं बेटियाँ,

भगवान की बनाई सुंदुर मूरत हैं बेटियाँ।


उन्हें पढ़ाकर तो देखो, 

कैसे सर गर्व से ऊँचा करती हैं बेटियाँ।


उन्हें बेटों के बराबर दर्जा देकर तो देखो, 

कैसे सारी जिम्मेदारियाँ निभाती हैं बेटियाँ।


उनसे रिश्ता बनाकर तो देखो, 

कैसे रिश्ते को अटूट बनाती हैं बेटियाँ।


उन्हें मौका देकर तो देखो, 

कैसे देश को आगे बढ़ाती हैं बेटियाँ।


उन्हें ऊँचा दर्जा देकर तो देखो,

कैसे अभिमान बढ़ाती हैं बेटियाँ।

भगवान की बनाई सुंदर मूरत हैं बेटियाँ.....।।


©️ शिवांगी सेन

(झाँसी, अखंड बुंदेलखंड़) 

12/5/2020, झाँसी



विशेष - 'बेटियाँ' शिवांगी सेन की पहली हिन्दी कविता है।

लघुशोध-प्रबंध "21वीं सदी में बुंदेली : एक मूल्यांकन" की प्रस्तावना - किसान गिरजाशंकर कुशवाहा 'कुशराज'

   * बुंदेलखंड़ कॉलेज, झाँसी (बुंदेलखंड़ विश्वविद्यालय, झाँसी) की 'परास्नातक हिन्दी' उपाधि हेतु आचार्य सजंय सक्सेना जी के निर्देशन में प्रस्तुत लघुशोध-प्रबंध "21वीं सदी में बुंदेली : एक मूल्यांकन" की प्रस्तावना *

             

अपनी माटी, अपना देश, अपनी भाषा और अपनी संस्कृति सबको प्रिय होती है और हो भी क्यों न। जिस माटी में हम जनम लेते हैं, जिस माटी का हम अन्न-जल ग्रहण करते हैं, जिस माटी की प्रकृति से हम प्राणवायु।ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं। उस माटी की आन-बान-शान की रक्षा करना हमारा पहला धर्म है। हमें अपनी माटी के कण-कण से लगाव होना ही चाहिए। अपनी माटी में उपजी भाषा और संस्कृति की अस्मिता बनाए रखनी चाहिए। हमें अपनी भाषा और संस्कृति को कभी भी नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि भाषा और संस्कृति ही हमारी दुनिया के सामने अनोखी पहचान बनाती है। अपनी भाषा और संस्कृति के बिना हमारी कोई स्वतंत्र पहचान नहीं बन सकती है। जो व्यक्ति अपनी भाषा और संस्कृति को छोड़ देते हैं और किसी पराई भाषा और संस्कृति को अपना लेते हैं, उनकी दशा गुलामों जैसी हो जाती है, उनकी कोई स्वतंत्र पहचान नहीं बचती है।



यदि हम अपनी व्यक्तिगत बात करें तो हमारी माटी बुंदेलभूमि है, जिसे 'बुंदेलखंड़' नाम से दुनिया में पहचाना जाता है। हम इसे 'अखंड बुंदेलखंड' कहते हैं। हमारी भाषा 'बुंदेली' है और मातृभाषा कछियाई है। बुंदेली अति प्राचीन भाषा है और कछियाई उसकी मुख्य बोली है। वर्तमान में बुंदेलखंड़ में 70% जनसंख्या किसानों की है इसलिए बुंदेली को हम 'किसानी' भाषा कहना उचित समझते हैं। बुंदेलीभाषियों की जनसंख्या लगभग 12 करोड़ है और अभी बुंदेली की लगभग 25 बोलियाँ प्रचलन में हैं। हमारी संस्कृति बुंदेली-संस्कृति है, जो किसानी-संस्कृति है। हमें अपनी बुंदेली माटी, बुंदेली भाषा, बुंदेलखंड राज्य और बुंदेली संस्कृति प्राणों से भी ज्यादा प्रिय है। हम अपनी बुंदेली माटी, बुंदेली भाषा और बुंदेली भाषा की रक्षा करना अपना धर्म मानते हैं। जब तक हमारी माटी, हमारी भाषा और संस्कृति की कीर्ति का परचम दुनिया में लहराता है, तभी तक हमारी कीर्ति की चर्चा होती है। इसलिए हमें अपनी भाषा और अपनी संस्कृति का प्रचार-प्रसार हर क्षण करते रहना चाहिए।



'21वीं सदी में बुंदेली : एक मूल्यांकन' नामक शीर्षक पर लघुशोध में हमने बुंदेली भाषा के उद्भव और विकास से लेकर 21वीं सदी के 24वें साल यानी 2024 तक ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों जैसे - समाज, साहित्य, शिक्षा, संस्कृति, पत्रकारिता, सिनेमा, राजनीति, सोशल मीडिया और बाजार आदि में बुंदेली की दशा और दिशा का संक्षिप्त मूल्यांकन प्रस्तुत किया है। इसके साथ ही बुंदेली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की अनुशंसा की है। वस्तुतः हमारा यह लघुशोध-प्रबंध 21वीं सदी के परिप्रेक्ष्य में बुंदेली भाषा का बहुआयामी संक्षिप्त इतिहास ही है।



प्रस्तुत लघु शोध-प्रबंध को पूर्ण करने में हमारे शोध-निर्देशक पूजनीय गुरूजी प्रो० संजय सक्सेना का अविस्मरणीय योगदान रहा है। अतः हम उनके प्रति भौत-भौत आभार व्यक्त करते हैं। अपने विभाग के आचार्यगणों में हम प्रो० नवेंद्र कुमार सिंह और डॉ० वंदना कुशवाहा का भी भौत-भौत आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होंने बुंदेली भाषा में शोध करने हेतु प्रेरित किया। इसके साथ ही हम प्रो० पुनीत बिसारिया, डॉ० रामशंकर भारती, डॉ० रामनारायण शर्मा और अभिनेता आरिफ शहड़ोली का भी भौत-भौत आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होंने साक्षात्कार देकर हमारे शोध की गुणवत्ता और विश्वसनीता में श्रीवृद्धि की। हम बुंदेलीभाषी जनता के प्रति भी भौत-भौत आभार व्यक्त करते हैं, जो बुंदेली भाषा को जीवंत बनाए हुए है। अंत में हम उन सब बुंदेलीसेवियों के प्रति भौत-भौत आभार जिनके ग्रंथों और बौद्धिक संपदा का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमने सहयोग लिया है।    

                                   

©️ किसान गिरजाशंकर कुशवाहा 'कुशराज'     

(शोधार्थी - हिन्दी विभाग, बुंदेलखंड कॉलेज, झाँसी)     

12 जून 2024, झाँसी



बुंदेलखंडी दुनिया

* बुंदेलखंडी दुनिया का प्रकाशन प्रारंभ *


जै जै बुंदेलखंड़! साथियों,

आज 15 अगस्त 2024 से हम 'बुंदेलखंडी दुनिया' डिजिटल पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ कर रहे हैं। ये पत्रिका बुंदेलखंडी समाज, साहित्य और संस्कृति की बकालत करेगी और देश-दुनिया में बुंदेलखंडी ज्ञान परंपरा की विजयी पताका फहराएगी।


अखंड बुंदेलखंड़ के निवासी 'बुंदेलखंडी दुनिया' में हिन्दी और बुंदेली में लेख और रचनाएँ - कहानी, कविता, निबंध इत्यादि भेजकर बुंदेलखंड के विकास में योगदान करें।


लेख और रचनाएँ यहाँ भेजें -

व्हाट्सएप : 8800171019

ईमेल : akhandbundelkhand@gmail.com


निवेदक -

 किसान गिरजाशंकर कुशवाहा 'कुशराज' 

(संस्थापक / संपादक - बुंदेलखंडी दुनिया)

15/08/2024, झाँसी



 

आखिर क्यों रह जाती है बुंदेलखंड की कुशवाहा किसान बेटियों की शिक्षा अधूरी - आरती कुशवाहा Aakhir Kyon Rah Jatee Hai Bundelkhand Ki Kushwaha Kisan Betiyon Ki Shiksha Adhoori - Aarti Kushwaha

आखिर क्यों रह जाती है बुंदेलखंड की कुशवाहा किसान बेटियों की शिक्षा अधूरी ? भारत में शिक्षा को मौलिक अधिकार घोषित किए जाने के बावजूद भी विभिन...