Sunday, August 18, 2024

कविता : बेटियों! अब तो उठाओ तलवार - प्रीतिका बुधौलिया

 * कविता : " बेटियों! अब तो उठाओ तलवार " *


कब तक होगा ये अत्याचार,

बेटियों! अब तो उठाओ तलवार।

कब तक होगा ये अत्याचार…


नाम मौमिता देवनाथ था जिसका, 

कोलकाता में वह रहती थी।

पली-बढ़ी वह जिस घर में,  

उनकी संतान अकेली थी।।


एक पिताजी मेहनत करता, 

अपनी संतान पढ़ाने को।

रात दिन वह एक है करता, 

बिटिया के सपने को पूरा करता। 


एक दिन ऐसा भी आएगा,

जब मेरी बिटिया का सपना पूरा हो जाएगा। 

इस उम्मीद भरी उन आँखों से, 

माता-पिता भरे हुए हैं आशा के सागर से। 


मेरे भी दिन बदलेंगे तब,  

डॉक्टर बन जाएगी मेरी बिटिया जब।

यह पल भी आने वाला था,

वह मंजिल मिलने वाली थी। 


एक परिवार तभी सुख पाता,

जब बिटिया का सपना पूरा हो जाता।

लेकिन वह दिन कैसे आ पाता, 

समाज यह सहन नहीं कर पाता।


हम बेटियों के जीवन में कहाँ सुख है आता,

जब भी सुख की बेला आती उससे पहले वह दिया बुझ जाता।

समाज की इस गंदी सोच को कैसे बदला जाएगा,

सरकारें तो बहुत बदलीं पर कानून कब बदल जाएगा।


समाज के दरिंदों ने न जाने कितने परिवारों को मिटाया है, 

डॉक्टर मौमिता जैसी बेटी को पुरुषों की गंदी सोच ने दफनाया है।

खत्म करो अब यह तमाशा समाज नहीं कुछ बोलेगा,

सरकार रहेगी शांत हमेशा वाचाल कभी ना बोलेगा।


जगो बेटियों! बनकर लक्ष्मीबाई हाथों में तलवार उठाओ,

 जो भी देखे नजर उठाकर उसको वहीं मार गिराओ।

ज्वाला हो तुम शक्ति हो तुम,  

अपनी शक्ति को पहचानो।


डरी हुई सी रहना,

अब यह तेरा काम नहीं।

  छोड़ो अब बहुत हुआ, 

  होगा अब नरसंहार यहीं।


स्त्री हूँ मैं नारी हूँ, 

         मैं कोई फूलों का हार नहीं। 

        तोड़ नहीं सकते तुम मुझको,

इतनी तुम्हारी औकात नहीं।


अभी यह ज्वाला बुझने न पाए, 

कानून नया अब बन जाए। 

बेटियों! अब तो उठाओ तलवार,  

ताकि दुनिया से दूर हो पाए अत्याचार।


©️ प्रीतिका बुधौलिया 

   युवा लेखिका, झाँसी

    (एक नई सोच)








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