Thursday, August 15, 2024

लघुशोध-प्रबंध "21वीं सदी में बुंदेली : एक मूल्यांकन" की प्रस्तावना - किसान गिरजाशंकर कुशवाहा 'कुशराज'

   * बुंदेलखंड़ कॉलेज, झाँसी (बुंदेलखंड़ विश्वविद्यालय, झाँसी) की 'परास्नातक हिन्दी' उपाधि हेतु आचार्य सजंय सक्सेना जी के निर्देशन में प्रस्तुत लघुशोध-प्रबंध "21वीं सदी में बुंदेली : एक मूल्यांकन" की प्रस्तावना *

             

अपनी माटी, अपना देश, अपनी भाषा और अपनी संस्कृति सबको प्रिय होती है और हो भी क्यों न। जिस माटी में हम जनम लेते हैं, जिस माटी का हम अन्न-जल ग्रहण करते हैं, जिस माटी की प्रकृति से हम प्राणवायु।ऑक्सीजन ग्रहण करते हैं। उस माटी की आन-बान-शान की रक्षा करना हमारा पहला धर्म है। हमें अपनी माटी के कण-कण से लगाव होना ही चाहिए। अपनी माटी में उपजी भाषा और संस्कृति की अस्मिता बनाए रखनी चाहिए। हमें अपनी भाषा और संस्कृति को कभी भी नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि भाषा और संस्कृति ही हमारी दुनिया के सामने अनोखी पहचान बनाती है। अपनी भाषा और संस्कृति के बिना हमारी कोई स्वतंत्र पहचान नहीं बन सकती है। जो व्यक्ति अपनी भाषा और संस्कृति को छोड़ देते हैं और किसी पराई भाषा और संस्कृति को अपना लेते हैं, उनकी दशा गुलामों जैसी हो जाती है, उनकी कोई स्वतंत्र पहचान नहीं बचती है।



यदि हम अपनी व्यक्तिगत बात करें तो हमारी माटी बुंदेलभूमि है, जिसे 'बुंदेलखंड़' नाम से दुनिया में पहचाना जाता है। हम इसे 'अखंड बुंदेलखंड' कहते हैं। हमारी भाषा 'बुंदेली' है और मातृभाषा कछियाई है। बुंदेली अति प्राचीन भाषा है और कछियाई उसकी मुख्य बोली है। वर्तमान में बुंदेलखंड़ में 70% जनसंख्या किसानों की है इसलिए बुंदेली को हम 'किसानी' भाषा कहना उचित समझते हैं। बुंदेलीभाषियों की जनसंख्या लगभग 12 करोड़ है और अभी बुंदेली की लगभग 25 बोलियाँ प्रचलन में हैं। हमारी संस्कृति बुंदेली-संस्कृति है, जो किसानी-संस्कृति है। हमें अपनी बुंदेली माटी, बुंदेली भाषा, बुंदेलखंड राज्य और बुंदेली संस्कृति प्राणों से भी ज्यादा प्रिय है। हम अपनी बुंदेली माटी, बुंदेली भाषा और बुंदेली भाषा की रक्षा करना अपना धर्म मानते हैं। जब तक हमारी माटी, हमारी भाषा और संस्कृति की कीर्ति का परचम दुनिया में लहराता है, तभी तक हमारी कीर्ति की चर्चा होती है। इसलिए हमें अपनी भाषा और अपनी संस्कृति का प्रचार-प्रसार हर क्षण करते रहना चाहिए।



'21वीं सदी में बुंदेली : एक मूल्यांकन' नामक शीर्षक पर लघुशोध में हमने बुंदेली भाषा के उद्भव और विकास से लेकर 21वीं सदी के 24वें साल यानी 2024 तक ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों जैसे - समाज, साहित्य, शिक्षा, संस्कृति, पत्रकारिता, सिनेमा, राजनीति, सोशल मीडिया और बाजार आदि में बुंदेली की दशा और दिशा का संक्षिप्त मूल्यांकन प्रस्तुत किया है। इसके साथ ही बुंदेली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की अनुशंसा की है। वस्तुतः हमारा यह लघुशोध-प्रबंध 21वीं सदी के परिप्रेक्ष्य में बुंदेली भाषा का बहुआयामी संक्षिप्त इतिहास ही है।



प्रस्तुत लघु शोध-प्रबंध को पूर्ण करने में हमारे शोध-निर्देशक पूजनीय गुरूजी प्रो० संजय सक्सेना का अविस्मरणीय योगदान रहा है। अतः हम उनके प्रति भौत-भौत आभार व्यक्त करते हैं। अपने विभाग के आचार्यगणों में हम प्रो० नवेंद्र कुमार सिंह और डॉ० वंदना कुशवाहा का भी भौत-भौत आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होंने बुंदेली भाषा में शोध करने हेतु प्रेरित किया। इसके साथ ही हम प्रो० पुनीत बिसारिया, डॉ० रामशंकर भारती, डॉ० रामनारायण शर्मा और अभिनेता आरिफ शहड़ोली का भी भौत-भौत आभार व्यक्त करते हैं, जिन्होंने साक्षात्कार देकर हमारे शोध की गुणवत्ता और विश्वसनीता में श्रीवृद्धि की। हम बुंदेलीभाषी जनता के प्रति भी भौत-भौत आभार व्यक्त करते हैं, जो बुंदेली भाषा को जीवंत बनाए हुए है। अंत में हम उन सब बुंदेलीसेवियों के प्रति भौत-भौत आभार जिनके ग्रंथों और बौद्धिक संपदा का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमने सहयोग लिया है।    

                                   

©️ किसान गिरजाशंकर कुशवाहा 'कुशराज'     

(शोधार्थी - हिन्दी विभाग, बुंदेलखंड कॉलेज, झाँसी)     

12 जून 2024, झाँसी



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